KurukhTimes.com

आदिवासी राष्ट्रपति और आदिवासी गांव-समाज -सालखन मुर्मू

देश ने एक आदिवासी संताल महिला द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाकर एक नया इतिहास बनाया है। दुनिया के सर्वाधिक बड़ी गणतंत्र भारत ने मिसाल कायम किया है। जो 200 वर्षों में भी अमेरिका नहीं कर पाया है। देश के लिए गर्व और सम्मान की  बेला है। परंतु आदिवासी समाज के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समृद्धि का जड़ उनका गांव- समाज है। जहां परंपरा के नाम पर कतिपय कुव्यवस्था, कुप्रथा, कुरीतियां अभी भी विद्यमान हैं। जहां आदिवासी स्वशासन व्यवस्था या ट्राइबल सेल्फ रुल सिस्टम (TSRS) में जनतंत्र और संविधान लागू नहीं है। गांव-समाज का राष्ट्रपति या ग्राम प्रधान (माझी बाबा) सबकी सहमति से नहीं वंशानुगत नियुक्त होता है और जाने-अनजाने संविधान, कानून, मानवाधिकार का घोर उल्लंघन करता है। डायन प्रथा, अंधविश्वास, नशापान, जुर्माना, सामाजिक बहिष्कार, वोट की खरीद-बिक्री, ईर्ष्या द्वेष, महिला विरोधी मानसिकता आदि इसके नमूना हैं। 

द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से आदिवासी समाज आज देश में बहुत गर्वित और सम्मानित हुआ है। उनकी आशा आकांक्षाएं भी आसमान को छूने को आतुर हैं। मगर उनके गांव - समाज में TSRS में रिफार्म या सुधार के बगैर सर्वांगीण विकास असंभव है। अतएव "आदिवासी सेंगेल अभियान" सभी आदिवासी गांव- समाज में आदिवासी राष्ट्रपति स्थापित करेगा। जो जनतंत्र और संविधान की रक्षा कर सकें।

सेंगेल (सशक्तिकरण) ने सालखन मुर्मू के नेतृत्व में 18.4.2022 को माननीय द्रौपदी मुर्मू को उनके रायरंगपुर निवास में मिलकर TSRS की खामियों और सुधार पर एक घंटा तक बिस्तार से चर्चा किया। तब  द्रौपदी मुर्मू ने समय के साथ सुधार को अनिवार्य बतलाया। तत्पश्चात 22.6.2022 को मिलकर उन्हें TSRS में  सुधार हेतु प्रस्तावित  "सेंगेल पुस्तक" भी भेंट किया। उम्मीद है माननीय द्रौपदी मुर्मू के मार्गदर्शन में देश के साथ सभी आदिवासी गांव समाज को भी जनतंत्र और संविधान की रक्षार्थ प्रेरणा मिलेगा।

परन्तु द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से भी कुछ अदिवासी खुश नहीं हैं। उनके अनुसार कुछ नहीं बदलेगा? खतरा बढ़ेगा। तो विकल्प क्या है?
क्या कोई गैर- आदिवासी के राष्ट्रपति बनने से बदल जाता? शायद तब भी नहीं।
तो क्योँ न हम नकारात्मक की जगह सकारात्मक सोचें। खुशियां मनाएं। गर्व और सम्मानित महसुस करें। नई सोच और संकल्प के साथ आगे बढ़ें। रोने से नहीं। सुधार, एकता और एजेंडा ( हासा-भाषा, जाति, धर्म, रोजगार...आदि) को सफल बनाने के संकल्प से आदिवासी समाज जरूर बदलेगा। राष्ट्रपति का पद और सम्मान, सपनों के सच होने की तरह है। जीत का फाटक है। दुःखी और कुंठित कुछ आदिवासी बताओ- द्रौपदी मुर्मू की जगह किसको बैठाने से तुम्हें खुशी मिलती?

ट्राइबल या आदिवासी, जैसे ही अपनी प्रकृति पूजा धर्म, सोच- संस्कृति आदि से अलग किसी भी दूसरे धर्म को अपना लेता है, जड़ों से दूर होने लगता है। जाने-  अनजाने  डीट्राइब हो जाता है। अतः प्रकृति के साथ जुड़े रहने की प्रवृत्ति को जीवित रखना अपने लिए, सबके लिए उत्तम है। भारत के आदिवासी फिलहाल प्रकृति पूजा धर्म को अलग अलग नाम से चिन्हित कर संवैधानिक मान्यता की मांग कर रहे हैं। जो मानवता के लिए भी वाजिब है। प्रकृति और पर्यावरण की  रक्षा के लिए भी जरूरी है। 2011 की जनगणना में सर्वाधिक 50 लाख आदिवासीयों ने सरना धर्म लिखा। इसे बृहद्द मान्यता मांग आंदोलन के रणनीति का आधार माना जा सकता है। चलो आदिवासी अस्मिता की इस सपने को पूरा करने के लिए दिल और दिमाग को बड़ा करें, एकजुट होकर आगे बढ़ें। चूँकि नाम अलग अलग हो सकता है, मगर भाव, चिंता और लक्ष्य एक है। चलो 9 अगस्त : विश्व आदिवासी दिवस और 15 अगस्त : स्वतंत्रता दिवस को सकारात्मक सोच, संकल्प और एजेंडा के साथ मनाएं। हम जरूर होंगे कामयाब।

Sections