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Folklore

लोक साहित्‍य, कथा कहानियां, गीत, आदि

सैन्दा गांव की करम कहानी

प्रस्तुत फोटो ग्राम सैन्दा, थाना सिसई, जिला गुमला (झारखंड) के करम परब पूजा-पाठ के बाद विसर्जन के समय का है। गांव के युवक-युवती भादो एकादशी को श्रद्धा भक्ति के साथ करम पेड़ की तीन डाली को लाकर गांव के पहान को सौंपते हैं। गांव के पहान, करम की डाली को श्रद्धा पूर्वक अखड़ा के बीच स्थापित करते हैं और गांव के सभी जनों के लिए करम देव एवं ईश्वरीय शक्ति से प्रार्थना करते हैं। बाद में सभी उपवास किये करमईत गण परम्परागत रूप से पूजा अराधना करते हैं। फिर दूसरे दिन दोपहर के बाद 3-4 बजे विसर्जन के लिए नाचते गाते पानी में बहा दिया करते हैं। विसर्जन के लिए गांव से बाहर पानी में बहाने के लिए ले जाने के समय का

दव ख़ंजपा जिनगी घी : कुंड़ुख कविता

यह कुंड़ुख़ कविता, झारखंड पुलिस सेवा में कार्यरत एक उरांव व्यक्ति की है। उन्होंने अपने समाज के लोगों के दिल को छू लेने वाली कविता लिखी है। यह देवनागरी एवं तोलोंग सिकि, दो लिपि में पठनीय है। आइये आगे देखें और पढ़ें -

उरांव समाज में सम्‍बन्‍ध विच्‍छेद की प्रक्रिया : एक लोकगीत में

यह विडियो 17 मई 2023  को शूट किया गया है। इस विडियो में गायिका श्री मती सुशीला टोप्पो, पति श्री रन्थु उरांव द्वारा अपने गीत में परम्परागत उरांव समाज में प्रचलित वैयक्तिक प्रेम के चलते अपने वैवाहिक संबंध तोड़ने के लिए एक बहन अपने भाई से निवेदन करती है। भाई कहता है - जाओ बहन जाओ, दामाद बाबू ले जाने के लिए आये हैं। इसपर बहन कहती है - नहीं भैया नहीं, मैं ससुराल नहीं जाउंगी,  मेरा हमउम्र साथी, मुझसे अत्यधिक प्रेम करता है। इसलिए हे भैया - आप मेरा डली ढिबा वापस कर दीजिए। मैं ससुराल नहीं जाउंगी। परम्परागत उरांव आदिवासी समाज में विवाह विच्छेद के लिए डली ढिबा (विवाह रस्म के शगून का प्रतीक धनराशि जिसे

मन्दर बिरो- झारखंड राज्य की पारंपरिक चिकित्सा

झारखंड प्रदेश खनिज व वन संपदाओं और जैव विविधता से परिपूर्ण है। उपलब्‍ध डेटा के अनुसार भारत के भौगोलिक क्षेत्र में प्रदेश का कुल वन क्षेत्र 29.61 प्रतिशत है। यहां के छोटानागपुर में शुष्क पर्णपाती वन औषधीय पौधों की खेती के लिए वातावरण सबसे उपयुक्त है। जंगलों में ऐसे मूल्यवान औषधीय पौधों को लगाने एवं संरक्षण करने पर ज़ोर दिया जा रहा है जिससे सेवा के साथ-साथ आमदनी भी बढ़ाई जा सके।

आदिवासी मौसम पुर्वानुमान पर जैव प्रौद्योगिकी विज्ञान आधारित शोध की आवश्‍यकता पर विचार हो

वातावरण हर समय बदल रहा हैं। वैश्विक मौसम पैटर्न को देखकर मौसम विज्ञानी ध्रुवीय परिक्रमा करने वाले उपग्रह की मदद से भविष्य की सात दिनों का 80 प्रतिशत तक सटीक मौसम पूर्वानुमान करते हैं। पर दस दिन या उससे अधिक समय का पूर्वानुमान केवल आधे समय के लिए ही सही होता है।

प्रकृति और कुंडुख भाषा विकास

भारतीय भूमि की यह विशिष्टता है कि यहाँ की भूमि में पानी और वाणी की विविधता है। भारतीय उपमहाद्वीप में कुड़ुख भाषी आदिवासी समूह निवास करते हैं। इस समूह की खास बात है कि यह प्रकृति द्वारा अनुशासित है। कुड़ुख भाषी जनजीवन में प्रकृति और मानव के मध्य का मधुर अंतर्सम्‍बंध स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। कुड़ुख भाषा के शब्दकोश में चिड़ियों का स्वर शामिल है। चिड़ियों ने कुड़ुख समूह को कई शब्द दिये हैं। मनुष्य के लिए इस से सुन्दर और कोई बात नहीं हो सकती !

कुड़ुख भाषा में एक गीत है :-

कुँड़ख़र ही कुड़ा-मोःख़ा सिखिरना अरा सिखाबअ़ना

kuEzxar hi kuzA mo:xA siKirnA arA siKAbahnA : baHnar – hullo pariyA nu namhay purxar tozaX-parqA arA nAl-JariyA abzA gane raHnum naman baCAbA:car. A bezA nu kanwA-xaVjpA gutTin begar bi:qkam mo:xA lagiyar. ahzan huE xe:nam mo:xA lagiyar. ku:l ge ki:zA laggo wim arA jiyA ge amm onkA laggo wim. avXe ku:l-ki:zA arA amm onkan metAbaHA ge tozaX parqA qA xaVjpan mo:xar warA JariyA qA amman onar bezan Kepcar.

कुंड़ुख़ भाषा में पहेलियों का प्रयोग

कुंड़ुख़ भाषा में पहेलियों का प्रयोग बखुबी होता है। बच्चों के लिए यह बौदि्धक एवं भाषा विकास का एक अनोखा तरीका है जिसे समाज में बच्चों को सिखलाया जाता है। आइये इसे जाने :–

सय बिमल टोप्पो की चाय बगान पर कुँड़ुख़ कविता तोलोंग सिकि एवं देवनागरी लिपि में

जुलूस ही मुंधवारे केरकन ख़इक्खकन गा डण्डा. नीःदी कूल चिचयारकन इन्कलाब ही डण्डी किर्र बरच एःरदन एड़पा नू मल्ला से गा मण्डी. राशन मल्ला तनखा मल्ला, मल्ला तो बोनस ओन्ना मल्ला अत्तना मल्ला मंजा सरबनास. ख़द्द चीं'ख़ी, मुक्का चीं'ख़ी‚ एःरर कट्टू नीःदी एन्दरा ईदिम तली बगनियर ही असल आजादी ?..