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विचार / Opinion

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एवं मातृभाषा शिक्षा

भारतीय संविधान के चौथे भाग उल्लिखित नीति निदेशक तत्वों में कहा गया है कि प्राथमिक स्तर पर सभी बच्चों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षण की व्यवस्था की जाए। सामान्य परिचय :- जब देश 15 अगस्त 1947 ई० को स्वतंत्र हुआ, तभी से ही भारत में शिक्षा नीति पर जोर दिया जा रहा है। सन् 1948 ई० में विश्वणविद्यालय शिक्षा आयोग डॉ० राधाकृष्ण की अध्यक्षता में बनी, फिर 1952 में माध्यमिक शिक्षा आयोग जिसकी अध्यक्षता श्री लक्ष्मण स्वामी मुदालियर ने की, जिसे मुदालियर आयोग के नाम से भी जानते है। 1964 ई० में शिक्षा नीति श्री दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में बनी जो कि 1986 का राष्ट्रीय शिक्षा नीति को कोठारी आयोग से जानत

आदिवासी समाज और मातृभाषा शिक्षा

परिचय: ‘‘शिक्षा और आदिवासी भाशा‘‘ एक गंभीर और संवेदनाील विशय है। इस विशय पर न तो समाज गंभीर हो सका, न ही सरकारी विभाग। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था सीधे तौर पर सरकार से संबंधित है और सरकार के पास भारतीय परिदृश्य में बहुत सारी जिम्मेदारियाँ है, जिसमें सर्वजन को समान अवसर प्रदान करने जैसी कठिन चुनौतियाँ हैं। ठीक इसके विपरीत, आदिवासी समाज बाहरी दबाव से इस तरह घिरा हुआ है कि वह अपना रास्ता ढूँढ नहीं पा रहा है। शिक्षा और आदिवासी भाशा का तात्पर्य है - शिक्षा में आदिवासी भाशा को शिक्षा का माध्यम बनाना अर्थात् डमकपनउ वि प्देजतनबजपवद घोशित करना। इस तरह शिक्षा का माध्यम घोशित होने का दृार्त है नए सिरे से

कुड़ुख़ लिपि दर्शन

भूमिका : कुड़ुख़ लिपि को तोलोंग सिकि के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यह लिपि कुड़ुख़ बोलने वालों की तोलोंग (परम्परागत वस्त्र) पहनने की कला तथा उनके घुमने-फिरने व काम करने के तरीकों के अनुसार बनायी गयी है। कहने का तात्पर्य यह कि तोलोंग-लिपि, कुड़ुख़ संस्कृति की विशेषताओं को उजागर करते हुए गढ़ी गयी है। चूँकि इस विषय पर पर्याप्त लिखा जा चुका है, इसलिए इस लघु लेख में कुड़ुख़ लिपि के दर्शन पर विचार किया जा रहा है। 

धुमकुड़िया कोरना अरा पूरना उल्ला (धुमकुड़िया प्रवेश तथा पूर्णता दिवस)

बअ़नर माघ चन्ददो नु ख़द्दारिन धुमकुड़िया मंक्खा लगियर अरा ख़द्दर माघ चन्द्दो नु धुमकुड़िया कोरआ लगियर। एन्नेम माघ पुनई 
गेम जोंख़ रअ़उर गही माघ पूरआ लगिया दरा पुना अड्डा नु मलता पुना चान नु माघ पुनई ख़ोःख़ा ती जोंख़ रअ़ना ओरे मना लगिया।

कुड़ुख़ भाषा के महत्‍व पर चर्चा

कुड़ुख़ भाषा का महत्‍व के बारे में चर्चा करते हुए डा० नारायण उरांव एवं उनकी कविता तोलोंग सिकि तथा देवनागरी में लिप्‍यन्‍तपण | कुड़ुख़ भाषा का महत्‍व के बारे में चर्चा करते हुए डा० नारायण उरांव एवं उनकी कविता तोलोंग सिकि तथा देवनागरी में लिप्‍यन्‍तपण..

     

आधुनिक कुँड़ुख़ व्याकरण: एक पुस्तक परिचर्चा

कुँडु़ख़ कत्था, द्रविड़ भखा खन्दहा ता ओण्टा अद्दी कत्था तली। ई कत्था गही ओःरे एका बेसे मंज्जा, का एकसन मंज्जा, का ने नंज्जा, का एका आःलर नंज्जर, इबड़ा मेनता (प्रश्न) गही थाह अक्कुन गूटी अरगी मना। पुरखर बाःचका रअ़नर - धरमे सवंग आःलारिन सिरजन-बिरजन नंज्जा अरा संग्गे-संग्गे आःलारिन कुँड़ुख़ कत्था हूँ सिखाबाःचा। बेड़ा सिरे आर, तमहँय ख़द्द-ख़र्रा रिन सिखाबाःचर। इबड़द एन्ने हुँ बाःतारई - नमहँय पुरखर, तमहँय पुरखर ती सिक्खरर अरा नमहँय पुरखर ही नें:ग-दस्तूर अरा लूर-घोःखन नाम सिखिरकत। एन्नेम हुल्लो परिया ती इबड़ा चलईन मन्नुम, अख़नुम, बुझुरनुम बरताःरआ लगी। ईन्नलता (आधुनिक) लूरगरियर हूँ बअ़नर - एका ख़द्दर, तंग

भाषा और लिपि, मानव विकास के लिए अनमोल रत्न

भाषा और लिपि, मानव विकास के लिए अनमोल रत्न से भी ज्यादा कीमती है। लिपि, भाषा की प्राण होती है। समाज, मानव समूह का सुरक्षा कवक्ष होता है। इन तीन चीजों के बाद विकास की संभावनाओं पर तथा समाज के विकास की सफलता और विफलता पर चर्चा किया जा सकता है।

ईसा से हजारों सालों पूर्व में भी मानव सभ्यता थी और ईसा के बाद 2020 ई॰ के बीत जाने के बाद भी मानव समुदाय और आदिवासी समाज का विकास के बीच एक अत्यन्त ही गम्भीर और ज्वलंत भय सा बना हुआ है। पूरी दुनियाँ विकास की बात से जुड़ी हुई हैं। कई देश विकसित हो गए है और अनेकों देश विकास के लिए प्रयत्नशील है।

कुँड़ुख तोलोङ सिकि की विकास यात्रा और राजी पड़हा, भारत का उद्घोष

कुँड़ुख भाशा की लिपि तोलोङ सिकि के बारे में कहा जाता है कि यह लिपि, भारतीय आदिवासी आंदोलन एवं झारखण्ड का छात्र आंदोलन की देन है। इस लिपि का शोध एवं अनुसंधान पेशे से चिकित्सक डॉ0 नारायण उराँव द्वारा 1989 में आरंभ किया गया। उन्होंने पहली बार 1993 में सरना नवयुवक संघ, राँची द्वारा आयोजित, करमा पूर्व संध्या के अवसर पर राँची कालेज, राँची के सभागार में प्रदर्शनी हेतु रखा। इस लिपि में पहली प्राथमिक पुस्तक ‘‘कुँड़ुख तोलोङ सिकि अरा बक्क गढ़न’’ के नामक से दिसम्बर 1993 में उशा इंडस्ट्रीज, भागलपुर (बिहार) में छपा और हिजला मेला, दुमका 1994 में, प्रदर्शनी के लिए रखा गया।                 

गुरूभक्त एकलव्य और गुरू द्रोणाचार्य

(माननीय सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा की खंडपीठ द्वारा माह जनवरी 2011 में दिये गए एक अभूतपूर्व फैसले के पश्चा1त् महान आदिवासी जननायक,  गुरूभक्त एकलव्य के स्मृति में गुरूभक्त एकलव्य जयंती सप्ताह के अवसर पर समर्पित) : एक कहावत है - ‘‘ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं।’’ यह कहावत ‘‘एकलव्य’’ नाम के साथ फिर से चरितार्थ हुई है। आदिवासियों को हाशिए पर धकेलने की प्रवृति पर चोट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में पांडवों के गुरू द्रोणाचार्य को आदिवासी युवक एकलव्य के साथ घोर अन्याय करने का दोषी पाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या के