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Folklore

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कुँड़ख़र ही कुड़ा-मोःख़ा सिखिरना अरा सिखाबअ़ना

kuEzxar hi kuzA mo:xA siKirnA arA siKAbahnA : baHnar – hullo pariyA nu namhay purxar tozaX-parqA arA nAl-JariyA abzA gane raHnum naman baCAbA:car. A bezA nu kanwA-xaVjpA gutTin begar bi:qkam mo:xA lagiyar. ahzan huE xe:nam mo:xA lagiyar. ku:l ge ki:zA laggo wim arA jiyA ge amm onkA laggo wim. avXe ku:l-ki:zA arA amm onkan metAbaHA ge tozaX parqA qA xaVjpan mo:xar warA JariyA qA amman onar bezan Kepcar.

कुंड़ुख़ भाषा में पहेलियों का प्रयोग

कुंड़ुख़ भाषा में पहेलियों का प्रयोग बखुबी होता है। बच्चों के लिए यह बौदि्धक एवं भाषा विकास का एक अनोखा तरीका है जिसे समाज में बच्चों को सिखलाया जाता है। आइये इसे जाने :–

सय बिमल टोप्पो की चाय बगान पर कुँड़ुख़ कविता तोलोंग सिकि एवं देवनागरी लिपि में

जुलूस ही मुंधवारे केरकन ख़इक्खकन गा डण्डा. नीःदी कूल चिचयारकन इन्कलाब ही डण्डी किर्र बरच एःरदन एड़पा नू मल्ला से गा मण्डी. राशन मल्ला तनखा मल्ला, मल्ला तो बोनस ओन्ना मल्ला अत्तना मल्ला मंजा सरबनास. ख़द्द चीं'ख़ी, मुक्का चीं'ख़ी‚ एःरर कट्टू नीःदी एन्दरा ईदिम तली बगनियर ही असल आजादी ?..

सय बिमल टोप्पो की कुँड़ुख़ कविता तोलोंग सिकि एवं देवनागरी लिपि में

हाथी हाथी ! हाथी ! हाथी ! इदा हाथी, अदा हाथी इसन हाथी असन हाथी सगरे दुनिया नू हाथी मुंधवारे हाथी, ख़ोख़ा हाथी पईरी न पुतबारी हाथी टोड़ंग नू हाथी, पद्दा नू हूं हाथी लुका ओदआ, फटका चो'ड़ताअ़आ ब'आ - हटो बबा, बुढ़ा बबा पीछे हटो गनेस बबा. (गणेश)

कुलदीप तिग्गा की कुंड़ुख़ कविता : देवनागरी लिपि एवं तोलोंग सिकि में

jingi| Bair bipaiq dahre
jingi| gA niMwirkA mal rahcA,
jingi| nu kayno dahre rahcA,
jingi| nu beMkko dahre rahcA,
bipaiq qi kiyyA-mayYA niMwirkA,
paheE ibzA jingi| gahi soBnA.
ak|un qA bezA nAm ekA qarA kA:loq,
barnA bezA nAm ekA se uj|oq,
akkun qA bezA nAm ujjA kA:loq,
barnA bezA nAm soJ kA:loq,
ekA bezA eQerLo ujjnA dahre.
i bezA soJ dahre kA:loq,
barA e:kqe De:r gecCA kA:loq,
jingi| e:rqe Aur gecCA kA:loq,

तोलोंग सिकि तोड़पाब (वर्णमाला) पर कुँड़ुख़ बाल कविता

तोलोंग सिकि तोड़पाब (वर्णमाला) पर श्री बिमल टोप्पो की कुँड़ुख़ बाल कविता का देवनागरी एवं तोलोंग सिकि में लिप्यान्तरण तोलोंग सिकि तोड़पाब (वर्णमाला) पर श्री बिमल टोप्पो की कुँड़ुख़ बाल कविता का देवनागरी एवं तोलोंग सिकि में लिप्यान्तरण तोलोंग सिकि तोड़पाब (वर्णमाला) पर श्री बिमल टोप्पो की कुँड़ुख़ बाल कविता का देवनागरी एवं तोलोंग सिकि में लिप्यान्तरण

ए:न ओन्टा मड़ा (मैं एक लाश) कुँड़ुख़ कविता तोलोंग सिकि में

नेड्डा 28/5/21 उल्लाA मंग्गeर गे "जनजाति दर्पण" पत्रिका (कोलकाता) तरती वेबिनार ही सराजमा नंज्जतका 
   नु कुँड़ुख़ कविता पाठ मंज्जा. अइय्या प्रतिभागी मनर सय बिमल टोप्पोणस ही कुँड़ुख़ कत्थ(डण्डीट (कविता) बँचतारा, आद बिमल भईयोस ही गछरना दरा आइनका ती‚ बचउर गे तोलोंग सिकि नु सिकिजुमा (लिप्युन्तआरण) ननर चि‍पतारकी बि’ई।
           
 
ए:न ओन्टा मड़ा
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ख़द्दी परब (सरहुल त्योहार)

नमहँय देश भारत नू अकय बग्गे भख़ा कछनखरऊ अरा नने किसिम गहि संस्कृति खोड़हा नू मेसेरका रअ़र्इ। हुल्लो परिया तिम इसन नने रकम जइतर तंगआ-तंगआ भख़ा-संस्कृति, परम्परा अरा विश्‍वासन अङिय’अर संग्गे-संग्गे रअ़ते बरआ लगनर। र्इवन्दा बेड़ा नू अकय किय्या-मर्इय्या मंज्जा। एका-एका जइतर गहि भख़ा-संस्कृति, इतिङख़ीरी गहि कगद नूम रर्इह केरा, पहें एका-एका खोड़हा गहि आ:लर, बिड़दो अरा ससर्इत बेड़ा नू हूँ तंगआ परम्परा अरा धरोहरन जतन’अर उर्इय्यर। र्इ भख़ा-संस्कृति नू ओण्टे कँुड़ुख़ भख़ा-संस्कृति हूँ रअ़र्इ। र्इ:द ओण्टे अद्दी भख़ा-संस्कृति गहि रू:पे नू अख़तार’र्इ। र्इ अद्दी भख़ा-संस्कृतिन अङियाचका आ:लर अक्कुन ता बेड़ा नू उराँव (कुँड़

करम परब गही ख़ीरी (करम त्योहार की कहानी)

बअ़नर - हुल्लो परिया नु ओरोत कुँड़ुख़ बे:लस ही रा:जी नु ओंगओल अनभनियाँ रा:जी कीड़ा मंज्जा। चेंप-झड़ी मल पुर्इंका ती खितीपुती मल मना लगिया। तूसा-झरिया, खाड़-ख़ोसरा, कूबी-पोखारी उरमी ख़ाया लगिया। मन्न-मास ही खं़जपा हूँ नठारआ हेल्लरा। ओना-मोख़ा गे मल ख़खरना ती टोड़ंग-परता ता अड़ख़ा-चे:खे़ल अरा बोकला गुट्ठीन मो:ख़र, आलर एकअम बेसे उल्ला खेपआ लगियर। चान-चान, चेंप-झड़ी मल मना लगिया। एन्ने नु कुँड़ुख़ बे:लस गे रा:जी चलाबअ्ना अफर्इत मंज्जा केरा। बे:लस ही ख़द्द-ख़र्रा मल रहचका चड्डे आस हेन्दवारकम रआ लगियस पँहेस रा:जी की:ड़ा बे:लासिन अउर बग्गे दुक्खे चिच्चा। बे:लस, बखड़े नु अख़आ-बल्ला उरमी मधे ही बर्इध-मती, ओहरा-बिनती अरा

बच्‍चों की कविताएं

बच्‍चों की कविताओं का चलन आदिवासी समाज में अरसे से चला आ रहा है। अक्‍सर बोल में या गीत के स्‍वर में इसका स्‍वरूप मिलता रहा है। एक से बढ़कर एक खूबसूरत और ज्ञानवर्द्धक बाल गीत चलन में सुना जाता रहा है। लेकिन अब जब कुंड़ुख समाज अपनी लिपि अपनी भाषा विकसित कर चुके है तो बाल गीत क्‍यों न सामने आयें। इसी उद्देश्‍य को मद्देनजर प्रस्‍तुत हैं डॉ नारायण उरावं द्वारा रचित कुल बाल गीतों का संकलन।

डॉ नारायण उरावं द्वारा रचित