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आलेख / Articles

सिरजन-बिरजन गही ख़ीरी (कुँड़ुख़) : उत्पत्ति का इतिहास

बअ़नर - एका बारी धरमेस मेरख़ा अरा ख़े़ख़लन कमचस आ बारी सँवसे ख़ेख़ेल अम्म ती निन्दका रहचा अरा गोट्टे नु उ:ख़ा दिम उ:ख़ा रहचा। इबड़न ए:रर धरमेस गे दव मल लग्गिया केंधेल, ख़ने आस बी:ड़ी कमचस। बी:ड़ी कमचका    ख़ो:ख़ा उरमी बेड़ा बिल्ली रआ हेल्लरा। आद हुँ धरमेस गे द:व मल लग्गिया केंधेल, ख़ने आस उ:ख़ा कमचस अरा उ:ख़ा नु बिलचा गे चन्नदो अरा बी:नको कमचस। इदी ख़ो:ख़ा धरमेस उरमी ती मुन्ध अम्म नु रअ्उ जिया-जँउतन कमचस। इदी ख़ो:ख़ा ख़र्इका ख़ज्ज नु रअ्उ जिया-जँउत कमआ बिद्दयस, पँहेस ख़ज्ज मलका ती ख़र्इका ख़े:ख़ेल कमआ खतरी अम्म किय्या ता ख़ज्जन ओन्दोरआ गे अम्म ता आ:लोन मी:ख़यस दरा आ:नियस।  धरमेस ही आइनकन मेनर उरमी ती मुन्ध ककड़ो बरचा अर

आदिवासी शिक्षा और मातृभाषा : एक चर्चा (-डॉ नारायण उरावं)

‘‘शिक्षा और आदिवासी भाषा‘‘ एक गंभीर और संवेदनाील विषय है। इस विषय पर न तो समाज गंभीर है, न ही सरकार। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था सीधे तौर पर सरकार से संबंधित है और सरकार के पास भारतीय परिदृश्य में बहुत सारी जिम्मेदारियाँ है, जिसमें सर्वजन को समान अवसर प्रदान करने जैसी कठिन चुनौतियाँ हैं। ठीक इसके विपरीत, आदिवासी समाज बाहरी दबाव से इस तरह घिरा हुआ है कि वह अपना रास्ता ढूँढ नहीं पा रहा है। शिक्षा और आदिवासी भाषाविषय का तात्पर्य है - शिक्षा में आदिवासी भाषाविषय को शिक्षा का माध्यम बनाना अर्थात् Medium of Instruction  घोशित करना। इस तरह शिक्षा का माध्यम घोशित होने की ार्त है नए सिरे से शिक्षक बहाली